~ तेरी दीवानी ~
बूंदे बरस जाओ आज झम-झम, की दिल भीग जान चाहता है, चाहत के बारिश मे तेरी; ऐ पवन तू यूंही चली चल, की उड़ने को व्याकुल हॅू मैं, तेरे चाहत के ख्वाब लिये ! ऐ जमीं तू भी अपनी तृष्णा बुझा ले, मैं तो मिल आई हॅू सजना से अपने, जो प्यासी थी मैं सदियों से, आज जाके कहीं दरिया मिला है, डूब जाउ अब कुछ ऐसे इस्में, जैसे सागर से मिले हो नदिया ! चॅदा तेरी चॅादनी मे आज ये नूर क्युं है ज्यादा, मैं तो सजना मिलो आई हॅू तो, चहक रही हॅू, तू क्युं यूं चमक राहा हैं, तेरी ही चॅादनी कुछ बड़ी हैं आज, या मैं ही बुद्धू, पगला सी गई हॅू सजना मिल ! क्युं ये पंक्षी भी इतना चहकते है, पहले कभी तो ऐसा ना था, सूरज कब से शीतलता देने लगा, इतनी तपन थी जो, वो सब गई कहां, पुष्पों पे कलरव करते भवरें, गुन-गुन गुनगुनाते हो जैसे, मद्धम, सुगन्धित, शीतल सी महक, बिखरी है जर्रे-जर्रे मे आज ! ऐ आसमा तू झूक गया है क्युं, मैं तो सजना संग तेरी छांव मै बैठूंगी, ठंडी छांव, चॅाद-तारो भरा तेरा आँचल होगा, और मैं सजना की बॅाहों मे ! गरम सांसो की गरमी लिये, नरम बॅाहों क...