रुसवाई
परछाई मेरी संग हैं हर पल तेरे ; मैं ना भी रह सका तो क्या गल हैं तू समझ ना सकेगी इस बात को; पर मजबूर था मैं भी कितना । सपने तेरे आज भी पलकों पर सजाये बैठा हूँ, कल ही की तरह ; दुवाओ में आज भी मांगता हूँ तुझे, हर बार की तरह ; मैं बेवफा कहलाया हूँ, दुनिया की नजरो में भले ही ; पर बेवफा नहीं तू जाने है ये सब ।। सोचा तो मैंने भी ना था कभी; की रुसवाई आएगी कभी हमारे बीच । पर किसे पता कल होना क्या है; कब साथ है कोई, और कब बिछड़ जाना है । बस एक गिला है जिंदगी से; जिससे किया खुशियो का वादा था उसे ही गम दे गया, जानता हूँ कितना तड़पी है तू, और मैं .......... तुझे तड़पता छोड़ गया ।।। फिर मिले कभी जिंदगी की राहो में ; अपनी सफाई पेस करूंगा तब तेरे सामने ; और सायद तू समझेगी मुझे, जैसे तू आज... । पर डर है तो बस एक बात का, की मैं पागल ना हो जाऊ उस कल के इन्तजार मे ; और मर ना जाऊ कही बिछड़ के तुझसे ।।।। । ... पंकज अधिकारी ... ।